मुंबई ट्रेन ब्लास्ट केस: केस ने यू-टर्न लिया, कोर्ट बोली: सब दोषी… नहीं

भोजराज नावानी
भोजराज नावानी

11 जुलाई 2006 को मुंबई की लोकल ट्रेनों में हुए श्रृंखलाबद्ध धमाकों ने देश को हिला दिया था। 189 लोगों की मौत, 824 से अधिक घायल – और 12 लोगों को मकोका अदालत ने दोषी करार देकर मौत और उम्रकैद की सज़ा सुनाई थी।

लेकिन अब, 18 साल बाद, बॉम्बे हाई कोर्ट ने वही केस पलटते हुए कहा – “दोष साबित नहीं हुए, इसलिए दोषी नहीं रहे।”

क्या हुआ था 2006 में?

पश्चिम रेलवे की लोकल ट्रेनों में 11 मिनट के अंदर 7 बम धमाके, और वो भी प्रेशर कुकर बम के ज़रिए।
इस घटना को आतंकवाद का बड़ा हमला माना गया। देशभर में उथल-पुथल मच गई, और तफ्तीश की रफ्तार भी उतनी ही तेज हुई – शायद तेज़ भी दिखी।

2015: विशेष अदालत का फैसला

मकोका कोर्ट ने 2015 में:

  • 5 आरोपियों को फांसी की सज़ा

  • 7 को उम्रकैद

फैसला इतना कड़ा था कि लगने लगा — “अब न्याय हुआ।” लेकिन जैसे-जैसे साल गुज़रे, अपीलें चलती रहीं… और अब 2025 में आया सुपर ट्विस्ट

2025: हाई कोर्ट का उलटा फैसला

लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक बॉम्बे हाई कोर्ट ने कहा:

  • सबूत अपर्याप्त

  • जांच प्रक्रियाओं में खामियां

  • कई परिस्थितियाँ संदिग्ध

और इसलिए –

“जिन्हें दोषी ठहराया गया था, उन्हें अब दोषमुक्त किया जाता है।”

अब सवाल ये है…

  • अगर ये 12 लोग दोषी नहीं थे, तो फिर दोषी कौन था?

  • 18 साल तक गलत सज़ा भुगतने वालों की ज़िंदगी कौन लौटाएगा?

  • और अगर कोर्ट का तर्क सही है, तो पहली अदालत ने इतना कड़ा फैसला कैसे दे दिया?

अदालत में सबूत चाहिए, भावनाएं नहीं; लेकिन जनता के पास सिर्फ़ भावनाएं हैं, और उन्हें हर बार धक्का ही मिलता है।

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